Sunday, November 27, 2011

मैत्री...

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ना जाने क्यों
बांध देते हैं
हम
मैत्री सी विराट
भावना को
समय
देह
और
नेह के
संकीर्ण
घेरों में..

होती है मैत्री
साक्षी
सत्य की
अस्तित्व की
जीवन की
काल की,
करते हुए
प्रवाहित
असीम जीवन उर्जा....

होती है
रूह
मित्र
रूह की,
गुरु भी,
सेवक भी,
प्रेरक भी,
मार्गदर्शक भी,
सखा भी
साथी भी
साक्षी भी...

(इसमें नया कुछ भी नहीं है...लेकिन कम में सब कुछ समेट लेने का प्रयास है. आशा है मेरे पाठक, एक एक शब्द पर गौर फर्मायेगे,)

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