Sunday, August 23, 2009

मुल्ला ने जर्मनी में साहित्य सभा में शिरकत की

कबूतरबाजी के किस्से आप सब ने हाल ही में मीडिया में देखे/पढ़े होंगे. कबूतरबाजी लखनवी नवाबों वाली नहीं, क्योंकि जब से जानवरों के लिए इतनी हमदर्दी पैदा हो गयी कि....कबूतरों ने भी खिलाफत शुरू कर दी, इसलिए इन्सान को ही कबूतर का नाम दिया जाने लगा....बिना वीसा पासपोर्ट के या और किसी बहाने, मसलन म्यूजिक/डांस शो वगैरह, बाहिर मुल्कों में लोगों की तस्करी करने को आजकल कबूतरबाजी कहने लगे हैं...प्रोफ़ेसर विनेश सर साहित्य के क्षेत्र में अन्तराष्ट्रीय स्तर के तमाशेबज़ हैं. ऐसी सेटिंग कर रखी है कि कभी किसी अदबी कांफ्रेंस में, तो कभी सांस्कृतिक या अध्यात्मिक बैठक में, कभी मैनेजमेंट सम्बन्धी विषयों पर बोलने के लिए सर बाहर मुल्क जाते रहतें हैं....छुट्टियाँ की छुट्टियाँ, मौज मस्ती भी, मेल मुलाकात भी और रौकडे भी. गोटी फिट करने के नुस्खे कोई सर से सीखे
आप सब जानते ही हैं कि जितना बड़ा विद्वान् होता है उसकी दोस्ती उतने ही बड़े मूर्ख से होती है, जितना बड़ा ईमानदार इन्सान होता है उसके दरबार में सबसे बड़ा बेईमान पाया जाता है....शायद विपरीतता का आकर्षण का कारण रहा हो. विनेश सर जैसा कि आप जानते हैं पढ़े लिखे शालीन मानव और उनके दोस्त मुल्ला ज़हीन मगर बेवकूफ, भावुक मगर दुष्ट....यारों के यार मगर मतलब परस्त. मगर ना जाने क्या जादू किया है मुल्ला ने सर पर भी कि आजकल मुल्ला पर तुरत लिखतें हैं, दीवानी सीरीज़ बेक सीट ले चुकी है. अभी पिछले दिनों सर ने कहा था कि उन्हें "बोबी डार्लिंग कि ब्रिगेड में शामिल होना पड़ेगा." शायद संगीता आपा के पोस्ट पर लिखा था, भाई बहन कि बातें हैं, जाने दीजिये. लेकिन जहाँ आग होती है वहीँ धुआं होता है...और जहाँ धुआं होता है वहां बर्फ नहीं आग ही होती है. कहने का मतलब यह है कि हमें आश्चर्य है कि विनेश सर मुल्ला कि बात क्यों नहीं टाल पाते. मुल्ला ने उनके आहारे कैसे कबूतर बाजी कि इसका किस्सा आपको बताऊंगी तो आप भी कुछ केयास लगाने लगेंगे. नो ओफेंस, मगर सोच्स्थान तो सभी का सक्रिय हो ही जाता है.
हुआ यूँ कि एक दफा जर्मनी में वहां के प्रबुद्ध लोगों ने भारतीय और जर्मन काव्य में सामंजस्य की चर्चा के लिए एक सम्मलेन का आयोजन किया. जहाँ विनेश सर को भी बुलाया गया....शायद शफक कम्युनिटी से भी दो विदुषी कवियत्रियों को विनेश सर कि अनुशंसा पर आमंत्रित किया गया था.....कुल मिला कर तीन लोगों को बुलाया गया था. विनेश सर ने संगीता आपा और मुदिताजी/मुझ में से कोई एक को मेरिट के आधार पर इस अन्तराष्ट्रीय सम्मलेन में ले जाना चाहा था. मगर मुल्ला आ गये आड़े. क्या घुट्टी पिलाई सर को कि उनके सोच बदल गये.....

मुल्ला बोला : "अमां! खयाल करो....मान लिया कि ये लोग अच्छा लिखती हैं मगर इन्हें कह मत देना, बुरा मान जाएँगी....तुम ठहरे छडे हालाँकि शरीफ हो.खुली सोचों वाले हो....इनका बहुत सम्मान करते हो....लेकिन दुनियादारी का लिहाज़ तो रखना ही पड़ेगा ना...." (मुल्ला पीक थूक कर चुप हो गये)...टुकुर टुकुर विनेश सर को घूरना शुरू कर दिया. विनेश सर- चुप !!! मुल्ला बोला: "पिछले दफा नायेदाजी भी कह रही थी पढ़ा लिखा होने से क्या है, विनेश बहुत सीधे दिल का है, मुल्ला खयाल रखना, यह मेरा देवर ही नहीं छोटा भाई है.. हमें कितनी बड़ी जिम्मेदारी दे दी है उन्होंने...फिर हम तुम्हारे दोस्त भी तो हैं मास्टर...हमें तो सब कुछ देखना पड़ेगा ना." तीर निशाने पर लगा था....सर नाना प्रकार के सोचों से घिर गये थे.
मुल्ला सौ घाघों का एक घाघ, उस ने सोचा ग्राउंड वर्क हो गया. लगा मिमियाने, " प्रोफ़ेसर, तुम को तो बस दूर के लोग दीखते हैं, पास बैठों की कोई क़द्र नहीं. अमां हमारी भी इच्छा है जरा जर्मनी घूम आने की. ऐसे तो ज़िन्दगी में कभी भी नहीं जा सकेंगे. तुम्हारे जैसा हमदम दोस्त मिला है....कितना दरियादिल है तुम....उंच नीच, जात पांत, मज़हब फिरका कुछ भी नहीं गिरा सकते तुम्हारी सोचों को...देखो ना कहाँ तुम कहाँ हम....क्या हुआ हम भी जमींदार खानदान के हैं मगर हमारा इतिहास तो तुम्हे बता ही चुके हैं. असली ठाकुर हो तुम तो....प्राण जाय पर बचन ना जाई.....कहा था ना उस दिन कि मुल्ला तुम्हारी ख़ुशी के लिए सब कुछ करूँगा. आज मौका आ गया है, अपने बचन पूरे करो, हम को भी अपने संग जर्मनी ले चलो....हमें तो अच्छा लगेगा ही तुम्हे भी हमारे जैसे दोस्त की सोहबत नसीब होगी."
टू कट इट शोर्ट, जैसे तैसे मुल्ला ने मास्टर को मन लिया कि उसे भी जर्मनी साथ ले जायेंगे. प्रोफ़ेसर बोला, "मुल्ला यह सम्मलेन भारतीय कवियों और जर्मन कवि गेटे के कार्यों में लक्षित साम्यता पर विवेचन करने के लिए है. मैं गेटे के कामों और हिन्दुस्तानी कवि जय शंकर प्रसाद पर पेपर प्रस्तुत करूँगा. तुम ग़ालिब और गेटे पर अपनी वार्ता पेश कर देना." मुल्ला बोला, " यार ग़ालिब चचा तो हमारे महबूब शायर है मगर यह गेटे जर्मन वाला तो हमारे लिए बिलकुल नया है." वैसे मुल्ला हर कोई शेर ग़ालिब के नाम से पढने के आदी हैं. विनेश सर बोले, "मुल्ला, काफी वक़्त है, तुम महक से या मुदिताजी से गेटे के बारे में जानकारी हासिल कर लेना. फिर मैं तो हूँ ना." मुल्ला लगा कहने, "घर की बात मास्टर बाहर नहीं जाये....जो करना है तुम ही कर दो.....लिख दो एक पेपर ग़ालिब और गेटे पर भी, हम रट्टा मार लेंगे और वहां उगल देंगे." यह बात ज्यादा प्रैक्टिकल थी. विनेश सर मान गये. मुल्ला हर मुश्किल को मौका समझनेवालों में है. संगीता आपा को खबर कर दी कि वोह, मास्टर और मुल्ला जर्मनी जा रहे हैं....संगीता आपा ने सोचा कि ऐसे जाहिल आदमी का साथ उचित नहीं, उन्होंने तवियत का बहाना बनाया और खिसक ली इस मनसूबे से.

मुल्ला के लिए यह समस्या नहीं अवसर था.
सरदार गुरबन्दर सिंह एक सेल्फ मेड इन्सान थे. अविभाजित पंजाब के किसी पिंड (गांव) की पैदाईश थी दारजी की. बाप वहां ताला चाभी वाले हुआ करते थे. बालक गुरबन्दर ने बाप से ताला चाभी के काम कि ट्रेनिंग ली थी. बंटवारा हुआ, यहाँ के लोग वहां और वहां के लोग यहाँ किसी तरह आये. गुर-बन्दर भी एक शरणार्थी के रूप में भटिंडा पहुंचे. अपने ताला चाभी के फन कि बदौलत चौधरी असरफ खान कि हवेली का ताला खोल कर काबिज़ हो गये. असरफ खान ना जाने क्या क्या ख्वाब लेकर उस पर गया था, और मुहाजिर बन कर रह गया...सुना है यहाँ का कारोबारी असरफ वहां बूट पोलिश करता था. हाँ तो हवेली पर कब्ज़ा किया, कई किरायेदार भी रख लिए.....वहां मोटर मेकेनिक का काम भी सरदार ने सीखा हुआ था, सो एक मोटर गराज भी खोल लिया. जोड़ तोड़ में माहिर अनपढ़ सरदार बस ठेकेदार बन गया, कोई २०० बस ट्रक सरदार के पास हो गये. सफ़ेद पायजामा कमीज पहनता...नीली पगडी लगाता....सरदार कि गिनती भटिंडा के इज्ज़तदार लोगों में होने लगी थी....सरदार हैदराबाद आता जाता रहता था....शायद किसी रिश्तेदार के यहाँ.....मुल्ला की दोस्ती रेल के डब्बे में हुई थी सरदार से और धीरे धीरे प्रगाढ़ हो गयी थी. सरदार ने मुल्ला से कहा था कि अपनी इज्ज़त में इजाफा करने के लिए उसे अगर बाहिर मुल्क जाने का चांस मिल जाये तो वाहे गुरु दी किरपा हो जाये....मुल्ला ने सरदार को फंसाया, उस से पहिले का कोई १० हज़ार का क़र्ज़ माफ़ करा लिया और ऊपर से २५ हज़ार और ऐंठ लिए. बोला मुल्ला आकर भोले भाले विनेश सर से, "मास्टर संगीताजी तो जाएँगी नहीं, क्यों ना सरदारजी को ले जाएँ, वे भी बुल्लेशाह और गेटे पर भाषण दे देंगे....तुम लिख देना सरदार आहिस्ता आहिस्ता रट्टा लगा लेगा, फिर पेपर तो रहेगा ही."
जैसा कि कहा जा चुका है किसी अज्ञात कारण से विनेश सर मुल्ला कि हर बात मानते हैं. थोड़े नाटक-नौटंकी के बाद सरदार का कार्यक्रम भी फाईनल हो गया.
यथा समय प्रोफ़ेसर विनेश राजपूत, मुल्ला नसरुद्दीन 'बदायुनी' और भाई गुर-बन्दर सिंह 'रंगीला' बर्लिन पहुँच गये. वहां के एक ऑडिटोरियम में सम्मलेन था....मंच पर तथा हॉल में....ग़ालिब, गेटे, जयशंकर प्रसाद, मेक्समुलर, गाँधी आदि हस्तियों के चित्र लगाये गये थे....भारत और जर्मनी के झंडों से हॉल को सजाया गया था......विनेश सर ग्रे सूट में, मुल्ला काली अचकन, सफ़ेद पायजामे औत टोपी में, सरदार जी सफ़ेद चूड़ीदार शेरवानी और नीली पगड़ी में बहुत जम रहे थे. हॉल में जर्मन नर नारी भरे थे...वहां के साहित्य प्रेमी जिन्हें बस जर्मन भाषा ही समझ में आती है. तीनों के पपेर्स का जर्मन तजुर्मा सर्कुलेट किया जा चुका था, हाँ यह तय था कि तीनों वक्ता अपना प्रस्तुतीकरण अपनी भाषा में ही करेंगे...विनेश सर हिंदी में, मुल्ला उर्दू में और सरदारजी पञ्जाबी में. मुल्ला और सरदार ने विनेश सर के लिखे संभाषण को हाथ तक नहीं लगाया था. खाने पीने में, मौजमस्ती में वक़्त गुजार दिया था. तीनों ही पोजिटिव माईंड वाले, मोमेंट्स में जीने वाले.......प्रोफेसर विनेश ने बहुत अच्छी तरह से बाबू जय शंकर प्रसाद और गेटे पर बोला. समझें या ना समझें जर्मनों ने तालियाँ बजायी. भाषण एक्स-टेंपो हमारे मुल्ला और सरदार जी का भी खूब रहा, दोनों ने अपने भाषण में कुदरती जोश के अलावा गीत/ग़ज़ल/गाना भी शामिल किया था....विनेश सर से ज्यादा तालियाँ दोनों ने बटोरी. .....कहते हैं, जब भी दोनों ग़ालिब-गेटे या बुल्लेशाह-गेटे के नाम लेते, जर्मन श्रोता झूम झूम कर तालियाँ पीटते, दोनों जब भी गाते तालियाँ और जोरों से बजती. कुल मिलाकर कार्यक्रम सफल रहा......खाली विनेश सर सिर धुनते रहे. आप सोचतें होंगे कि जब मुल्ला और सरदार ने भाषण रट्टा नहीं तो क्या बोला था...और वह इतना असरदार क्यों था ? दोनों के भाषण आपके अवलोकनार्थ प्रस्तुत है.

मुल्ला का प्रेजेंटेसन (just sample)

खवातीन हजरात ! ग़ालिब गेटे अपनी अपनी माँ के बेटे (तालियाँ) ....ग़ालिब-गेटे बिस्तर पर लेटे.(तालियाँ) इंडिया जर्मनी....ग़ालिब गेटे.....नौकर से कहो बिस्तर समेटे.(तालियाँ) जनाब हैदराबाद में आकर अगर कल्लू मियां की हैदराबादी बिरयानी ना खाई तो क्या किया, बड़े बड़े देगों में चावल के दाने केशर में लपेटे---ग़ालिब-गेटे (तालियाँ) जुम्मन मियां कि बीवी जमालो पड़ोसी के साथ भाग गयी....जुम्मन अब कैसे गुज़रे दिन और रात लूंगी लपेटे...ग़ालिब-गेटे.(तालियाँ) अब लगे गाने : सितारों में मुहम्मद नज़रों में मोहम्मद, मोहम्मद ही मुहम्मद है.....(तालियाँ..) बलमा हमार मोटर कार लईके आयो रे ....बलमा हमार...ग़ालिब-गेटे (तालियाँ) . हैदराबाद का एअरपोर्ट शहर के बीच में हैं....इंडिया-जर्मनी. हैदराबाद आयें तो सलारजंग म्यूज़ियम ज़रूर देखिएगा-ग़ालिब-गेटे.(तालियाँ) चारमिनार इलाके में आपको सब कुछ मिलेगा-ग़ालिब-गेटे.(तालियाँ) बंजारा हिल्स पोश इलाका है, वहां रहने का मज़ा ही कुछ और है (ग़ालिब-गेटे) तवायफ हूँ मुजरा करुँगी..ग़ालिब-गेटे (तालियाँ).................(सैम्पल-ऐसा ही कोई एक घंटा चला)

सरदार गुर-बन्दर सिंह जी की तक़रीर

फायियों pharjayiyon ! हुन तुसी स-दार कुर-बन्दर से खबरें सुणो....बुल्लेशाह-गेटे ! ओजी दिल्ली ते विच साढे नेताओं ने भांगडा पाड़ा...बुल्लेशाह-गेटे. ताला कोई सा हो जी, असी उस दी चाभियाँ बना संकदा...बुल्लेशाह-गेटे...पंजाब मेल जेहडी चंगी कोई ट्रेन नहीं, थ्री टियर विच बाबूजी नूं पैसा फड़ा ते सो जाओ, भटिंडा आ ज्याना....जर्मनी-इंडिया. ओये तुतक तुतक तुतीय..हे जमालो... बुल्लेशाह गेटे...
काली तेरी चोटी है परांदा तेरा लाल है...बुल्लेशाह-गेटे. हो मोला कि जाना मैं क्या चीज हुन....मैं धोबी नहीं लोहार हुन....बुल्लेशाह दी गलां गेटे नु सुनावां..... साढे नाल कोई दौ सो बसां है...टाटा दी है, अशोक लेलैंड दी है, वोल्वो दी है.....सब चंगी है.....इंजन चंगा, बॉडी चंगी, एक्सीलेटर चंगा....जे नहीं चंगा उस नूं असी चंगा कर दिता.....बुल्लेशाह-गेटे (तालियाँ)..........(सैम्पल....ऐसा ही कोई एक घंटा चला.)


(the plot of this post is partially inspired by a urdu story by Krishan Chander and another by Pakistani writer Shaukat Thanwi-----though this presentation is original in totality )

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