Saturday, August 8, 2009

धीरजधर/Deerajdhar

धीरजधर
सागर सा
कहाँ
जो सहता हर
प्रतिघात,
करती रहती
लहरें
निशि दिन
नाना रक़म
उत्पात.............

Dheerajdhar
Sagar sa
Kahan
Jo sahta har
Pratighat,
Karti rahti
Lahren
Nishi din
Nana rakam
Utpat...........

Friday, August 7, 2009

पात्रता/Patrta...........

विराजित स्थिर
बूँद एक ओंस की
शूल की नोक पर
दिया है स्थान
धरा ने
जलधि को
सीना स्वयं का
चीर कर
किन्तु सागर है
आडोलित
अस्थिर
कंटक है कैलाश
बूँद शिव शम्भु
परमेश्वर.....

Virajit sthir
Boond aek aons ki
shool ki nok par
Diya sthan
Dharaa ne
Jaldhi ko
Seena swayam ka
Cheer kar
Kintu sagar hai
Adolit asthir
Kantak hai kailash
Boond Shiv Shambhu
Parmeshwar............

Thursday, August 6, 2009

शमीम/Shameem...........

फूल !
रूप पाया तू ने
माटी से
सूरज से पाए हैं रंग
छुयेगी पवन तुझ को
फैलेगी महक चहुँ दिशी
बन कर शमीम.....

शमीम=खुशबूदार हवा का झोंका

Phool !
Roop paya hai tu ne
Maati se
Suraj se paye hain rang
Chhuyegi pawan tujhko
Failegi mehaq chahun dishi
Ban kar shameem...........

Shameem=Khusboodar hawa ka jhonka.

Wednesday, August 5, 2009

परनिंदा...

# # #
रखने
काबू में
जुबान को,
किये थे
कुदरत ने
जतन बहुत से,
बना कर
परकोटा
होठों का
जड़ा था
ताला मौन का,
सौंप दी थी
कुंजी ज्ञान की
इंसान को....

नहीं हुआ था
सहन यह सब
जीभ की
बालसखी
'पर-निंदा' को,
पड़ गयी थी वो
चिंता में,
कैसे करे मुक्त
जिव्हा को
प्रकृति के
कारागृह से....

एक दिन
देख कर
नितांत एकांत
जा पहुंची थी
'परनिंदा'
मानव मन की
अट्टालिका में
मानव
भूल गया था
आपा अपना
सुनकर
कर्ण-मधुर
चिकनी चुपडी
बातें उसकी ......

किया था
क्रियान्वन
परनिंदा ने
अपने मंसूबों का,
करके महसूस
इन्सान को
वश में अपने
चुरा ली थी
कुंजी ज्ञान की,
और
खोल कर
मौन के ताले को
निकल आई थी
संग जिव्हा के.......

Tuesday, August 4, 2009

अर्जीनवीस/arzinavees

मिल जाती गर
फूल को
उम्र खार की,
खिजां और बहार
गवां देते मायने अपने,
हमारा अजीम शायर
'वक़्त'
बन कर रह जाता
महज़ एक अर्जीनवीस........

खार= कांटा, खिजां=पतझड़ ऋतु, बहार= बसंत ऋतु, अर्जीनवीस=प्रार्थना-पत्र लिखनेवाला( अक्सर कचहरी के बाहर बैठते हैं और अर्जियां, हलफनामें, दलील वगैरह की बंधी बंधाई सी रूटीन ड्राफ्टिंग करतें हैं)

Mil jati gar
Phool ko
Umr khaar ki
Khizan aur bahaar
Ganwa dete mayne apne
Hamaara azeem shayar
Waqt
Ban kar rah jata
Mahaz aek arzinavees..........

Khaar=kaanta, Khizan=patjhad ritu Bahaar=basant ritu, Arzinavees=one who sits near court and earns his livelihood by writing applications, affidavits, deeds etc. in routine language which lacks flow and rhythm.

Sunday, August 2, 2009

घर का भेदी लंका ढावे/Ghar ka bhedi lanka dhawe....

पांव ने पूछा था
सुई से
कैसे निकाल पाती हो तुम,
जल्द इतना कांटे को
"भोले ! सूना नहीं तुमने
घर का भेदी लंका ढावे."
दिया था जवाब सुई ने.........

Paon ne puccha tah
Sui se
Kaise nikaal pati ho
Jald itna kaante ko
"Bhloe ! suna nahin tumne
Ghar ka bhedi lanka dhawe."
Diya tha jawab sui ne........

भाईचारा

बैठ गया था आकर कौवा एक
अड्वे के मस्तक पर
मार मार कर चोंच उसने
हंडिया से सिर पर,
परख लिया था कि
पुतला है निर्जीव.........

कौवे ने कांव कांव का सुर छेड़
दे दिया था नेह निमंत्रण
अन्य पक्षियों को :
आ जाओ भाईयों
होकर निर्भय
क्यों ना चुगा जाय खेत को
मिटाने हेतु तीव्र उदराग्नि को .........

कृषक ने देखा था मंज़र
पखेरुओं की टोली
चुगे जा रही थी खेत
करते हुए अदा शुक्रिया
दिलदार कौवे का,
लगा निशाना गुलेल से
मारा था ढेला
उसने कौवे पर,
हो गया था ढेर तत्क्षण
काक सुजान
उड़ गये थे सारे पखेरू
होकर भयातुर और परेशान.....

सिखाना है सबक सबको
सोच रहा था किसान
बांध पंजों से लटकाया था उल्टा
मृत कौवे को उसने
बीच खेत में खड़ी
एक खेजडी पर
ताकि हों जाएँ सब भयभीत
खेत चुगने की फिर से
हो ना कोई बातचीत ........

देख शव निज बंधु का
अनगिनत कौवे
मचा रहे थे 'कांगारोल'
उछल उछल कर
और मारे जा रहे थे चोंच
अडुवे के सर पर.........

काश होती मनुष्य जाति में भी
ऐसी संवेदना
ऐसी एकता
ऐसा भाईचारा............

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(यह कविता एक राजस्थानी दृष्टान्त को शब्द देने का प्रयास है... कुछ राजस्थानी शब्दों का प्रयोग किया गया है जिनके मायने भी दिए जा रहें हैं)

१) अडुआ=बिजूका, याने एक पुतला जिसे घास-बिचाली-बांस आदि से बनाया जाता है...आदमी के कपडे पहनाये जातें हैं, हंडिया से सिर बनाया जाता है, और खेत में पक्षियों को डराने के लिए स्थापित किया जाता है.

२)खेजडी= एक पेड़ जो रेगिस्तान में होता है.

३)कांगारोल = शोर से तात्पर्य है.