Wednesday, March 31, 2010

Fool.....( १ अप्रैल २०१०)

# # #
jao ja kar
us fool ko
is fool ka
aek fool sa
salam dekar
kaho,
aek fool ne
unko
aek fool ki
saugat bheji hai...

saugat ka
yah fool
unke fool se
chehre par
bane foole se
jude men
sajega,
unki foolwari ke
foolon ki
bahaar dekh kar
is fool ka bhi
jee machlega....

unke 'aey fool !'
kahne par
yah fool
kaanton se
dosti karega
kante jyon ke tyon
rah jayenge,
aur yah fool
fool ki tarah
murjha kar
mitti men mil jayega,
fool kahin ka !

hai na
cool
fool.......:)

नहीं अँधा उसका नेह...

# # #
असह्य
अलाव में
पक कर
हुई
सुदृढ़,
घट कच्चे की
देह,
कुम्भकार को
साधुवाद !
नहीं
अँधा
उसका नेह...

Tuesday, March 30, 2010

फ़ित्रत.......


# # #
दिखा था
बस
चेहरा मेरा
आईने में ;
अक्स-ए-फ़ित्रत
नहीं,
हुआ था
अफशा-ए-राज
फ़ित्रत का
चली आई थी
मैं जब
खुद में.......

Monday, March 29, 2010

नज़र...

# # #
पड़ी थी
हाथी पर
चींटी की
नज़र,
खाता है
जब
यह भी
पेट भर
है फिर मुझे
क्यूँ हो
बेवज़ह
अपनी
फ़िक्र....

Sunday, March 28, 2010

चकाचौंध.......

# # #
डरती हूँ
छोड़ने से
मज़बूत हाथ
तारीकी का,
भटका न दे
मुझे
चकाचौंध
नकली
रोशनी की...

(तारीकी=अंधकार : यहाँ अंधकार से मतलब गहरायी से है, जहालत से नहीं)

Saturday, March 27, 2010

पराया है.....(राजस्थानी/हिन्दुस्तानी)


पूर्व कविता की श्रृंखला में एक और प्रयास सप्रेम प्रस्तुत है....

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परायो है....(राजस्थानी)

# # #
जीवण री
आरसी मं
चितराम ओं
परायो है,
इण जमीन र
उपरलो ओं
आभलो
परायो है....

कुण किण र
हिन्व्ड़े बसे
कुण किण री
आँख्यां मं है,
एक संसार
आपणो है
बीजो संसार
परायो है....

चाहवे कित्ती ही
सोरप है
चाहवे कित्ती
मौजा मन री,
म्हारी गुवाड़ी स्यूं
दूर रह्याँ
मेहल हर एक
परायो है....

जद स्यूं
न्याव
डूबी म्हारी
म्हे बैठ्या
एक ज़ज़ीरे पर,
दूर दूर ताईं
फैल्योड़ो ओं
समदरियो
परायो है....

इण राम धणक स
सुपण मं
रुत हरेक तो
म्हारी ही,
आँख खुली जद
के देख्यो ?
हरेक मिनख
परायो है...

पराया है........(हिन्दुस्तानी)
# # #
जीवन-दर्पण के
सीने में
बिम्ब प्रत्येक
पराया है,
धरा सुहानी
अपनी है पर
नील गगन
पराया है...

कौन किसी के
ह्रदय बसा
कौन स्थिर
किन नयनन में,
यहाँ एक
संसार हमारा है,
दूजा संसार
पराया है....

चाहे कितनी ही
सुख़-सुविधा,
चाहे जितनी ही
मौज भी हो,
अपनी कुटियाँ से
दूर रहूँ तो
प्रत्येक महल
पराया है....

नौका डूबी
जब से अपनी
बैठी हूँ
द्वीप निर्जन पर मैं,
अगण्य सा
विस्तार लिए
सागर विशाल
पराया है....

इन्द्रधनुष से
सपने में
ऋतु प्रत्येक तो
अपनी थी,
आँख खुली तो
यह पाया
इन्सां हर एक
पराया है....

Friday, March 26, 2010

अश्क जो टपके पलकों से...

# # #
अश्क जो
टपके
पलकों से
ढल गये वो
संगरेज़ों में,
काम तेरे
आये थे वो
हम को ही
सताने में...

आखरी
टीस जो
दी थी
तूने हम को,
मजबूर थे
हम
कितने
अनकही बातें
जुबाँ पे
लाने में.........

कर लिए थे
हाथ
काँटों से
जख्मी
हम ने,
एक
फूल को
बेणी में
अपनी
सजाने में...