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खिंची जा सकती है
लकीरें
पत्थर पर
बनाने
कोई चेहरा
(मगर)
बिना रंगों के
नहीं होगी
तस्वीर जिन्दा.....
की जा सकती है
इकठ्ठा
भीड़ अल्फाज़ की
(मगर)
बिना ज़ज्बात-ओ-मायने
नहीं होगी
ग़ज़ल जिंदा.....
जोड़े जा सकते हैं
तुक मुकम्मल
(मगर)
दिल में ना हो
साज़-ओ-मोसिकी
नहीं होगा
नगमा जिंदा.....
Saturday, February 27, 2010
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