Tuesday, April 6, 2010

नीलकंठ....

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'मोरिया'
बनाता है
भक्षण
भुजंग को,
नहीं मारता
विष किन्तु
उसके
अंग प्रत्यंग को,
मानव के
स्वभाव में
भरा है
अविश्वास,
शिव-सत्य
प्रतिपादन हेतु,
बनाया प्रभु ने
मयूर
मनोहरी
नीलकंठ को....

(बीजू दी के प्रोफाइल में पोस्टेड फोटोज में एक चित्र राजस्थान में नृत्य करते हुए मोर का था, उसे देख कर यह कविता उपजी.)

Monday, April 5, 2010

कृपण दर्पण........

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कैसी
भिखारन है री
तू,
कुछ नहीं देगा
तुझको,
यह
कृपण
दर्पण,
चाहे रीझ
चाहे खीज,
बना चाहे
नयनों को
आषाढ़
या
सावन....

Sunday, April 4, 2010

चोरों के राजा तोहे मैं प्यार करती....

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फूलों से
मधु रस
चुराने वाले
भ्रमर दीवाने
तोहे
मैं प्यार करती....

छींके पे
राखी
नवनीत हांड़ी,
माखन-चोर चटोरे
तोहे
मैं प्यार करती...

श्री राधिकाजी का
ह्रदय चुराया,
हे चितचोर बाँके
तोहे
मैं प्यार करती...

सूरज से
चुरायी
रश्मियाँ
रोशनी की,
शशि शीतल सलोने
तोहे
मैं प्यार करती....

चैन चुराया
मेरी नींदिया चुरायी
परदेशी रसिया
तोहे
मैं प्यार करती....

चोरी बुरी है
सब कोई कहते,
चोरों के राजा
तोहे
मैं प्यार करती.....

तकदीर.....

# # #
वक़्त की
चाल है
उलटी-सीधी,
हम भी
हो लेते हैं
पीछे उसके
नाम
तकदीर का
देकर...
छू सकता है
इन्सां
उंचाईयां
आसमां की
हौसला
तदब्बुर-ओ-तदबीर का
लेकर,
कहा भी है :
जे मददते खुद
ते मददते खुदा
बादशाह की बेटी
फकीर से निकाह.....

(तदब्बुर=दूरदर्शिता/विवेक/समझदारी/foresight/prudence, तदबीर=उपाय/युक्ति/solution/remedy/device)

Saturday, April 3, 2010

वहदत........

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नन्ही बूँदें
बारिश की
गिरी
आसमां से
कोहसार पर,
फिसल गई
डर गई
सोचा
मर गई,
लुढ़कते
लुढ़कते
हुई
शरीके-ग़म-खुदाई
खुद सी
सहमी हुई
चन्द और बूंदों से,
वहदत में
बन गई
एक नदी,
लगी दौड़ने
जानिबे-मंजिल
मिलने को
बहरे-बेकराँ से.....

(कोहसार=पर्वत श्रृंखला, शरीके-ग़म -खुदाई=संसार के दुखों की साझीदार, वहदत=एकत्व,जानिबे-मंजिल=मंजिल की तरफ, बहरे-बेकराँ=फैला हुआ समंदर)

Friday, April 2, 2010

पर-उपकार......

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कहते नहीं है
पांव कभी
ढोयें हम
सिर पे रखा
कोई भार,
कर्म अपने को
ना कहे
करूँ मैं
पर-उपकार......

Thursday, April 1, 2010

आतम परकास.....

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धूना रमाया
भूनी काया,
मनुआ उड़े
अकास,
लक्कड़ बाळ
राख किन्ही
ना भया
आतम
परकास.....