Tuesday, August 18, 2009

रोम रोम में/Rom Rom men.........

ताम्बे के कलश ने
आखिर पूछ ही
लिया था
मिटटी के घडे से:
"जल
मेरे साथ उष्ण
तुम्हारे संग शीतल
हो जाता है क्यों ?"
"बात बस इतनी ही है
तुम रखते हो उसे जुदा
और मैं तो
समा लेता हूँ उसे
रोम रोम अपने में"
दिया था उत्तर घडे ने........

Tambe ke kalash ne
Aakhir puchh hi liya tha
Mitti ke ghade se:
"Jal mere sath ushna
Tumhare sang sheetal
Ho jata hai kyon ?"
"Baat sbas itni hi hai
Tum rakhte ho use juda
Aur main
Sama leta hun use
Rom rom men apne."
Diya tha uttar ghade ne.....

Sunday, August 16, 2009

निर्वात/Nirvaat

बहुत जी ली है
जग की परिभाषाएं
जी लूंगी और भी,
सोच ना पाई थी
कभी
स्वयं को...
जिंदगी की
आपाधापी में,
होता रहा
महसूस
एक निर्वात सा,
स्पर्श तुम्हारे ने
बिन छुए ही
छू लिया
मेरे सत्त्व को
बढ़ गयी है
तड़फ
बदलने
निर्वात को
संपूर्णता में
शून्यता में..............

निर्वात=Vaccum (in the sense of Physics), शून्यता = Emptiness, void (in the sense of philosophy/spirituality), सत्त्व=Essence सम्पूर्णता=wholeness.

रातें मचलती रही...............

दिन ढलते रहे
रातें मचलती रही
वो तो पत्थर रहा
मैं पिघलती रही........!!दिन ढलते रहे- रातें मचलती रही !!


बिजली गरज़ती रही
बारिश लरज़ती रही
मैं तड़फती रही
हरसू जलती रही..........!! दिन....!!

चाहत डरती रही
जुबाँ अटकती रही
मैं भटकती रही
यूँ ही चलती रही .........!! दिन......!!

बाहें ठंडी रही
साँसे मंदी रही
नज़रें अंधी रही
हर शै खलती रही .......!! दिन....... !!

पीड़ा बढती रही
शूलें गड़ती रही
खुद से लड़ती रही
नज़रें संभलती रही ......!! दिन ........!!

दस्तक होती रही
मोहलत सोती रही
फुर्सत रोती रही
कुंठा पलती रही .........!! दिन......... !!

झूठें छुटती रही
सोचें उठती रही
क़समें टूटती रही
रस्में बदलती रही .......!! दिन...........!!

रोशनी होती रही
फिजा महकती रही
शामें चहकती रही
कलियाँ खिलती रही .....!! दिन.....!!

Friday, August 14, 2009

यहाँ भी-वहां भी........

हीर राँझा
शीरीं फरहाद
लैला मजनूं
सोहनी माहिवाल की
मोहब्बत को
गाया जाता है
यहाँ भी
वहां भी.........

उर्दू सी मीठी जुबान
ग़ालिब के शे'र
मीर की ग़ज़ल
बुल्लेशाह का तराना
खुसरो के नगमे
ठुमरी दादरा
नातें कव्वाली
एक से हैं
यहाँ भी
वहां भी...........

काली दाल
तंदूर की नान
सरसों का साग
मकई कि रोटी
अवधी बिरयानी
मुगलई पकवान
जायेका देते हैं
यहां भी
वहां भी......

अम्मी का लाड़
अब्बा की डांट
भाभी की प्यार भरी च्यूंटी
देवर की ठिठोली
सास ननद की बातें
पड़ोसी की ताका झांकी
हमसाया की मददगारी
यारों कि यारी
बारात के हंगामे
बिटिया की आंशुभरी विदाई
रिश्ते-नातों की खुशियाँ
नाते-रिश्तों के दर्द
समाये हैं ज़िन्दगी में
यहाँ भी
वहां भी...........

इन्त्ज़ामियां की ज्यादती
सिफारिश और घूसखोरी
लुकाव-छुपाव-दुराव
दोगली सियासत
शोर्ट कट का ज़ज्बा
झूठ और फरेब की बातें
अमीर गरीब के दरमियाँ खाई
लीडरों की बेवफाई
कमोबेश
यहाँ भी है
वहां भी.....................

फर्क कुछ नहीं
काट रही है
नयी पौध
फसलें ज़हर की
बोये थे बीज जिस के
सियासतदानों ने
फिरकापरस्तों ने
कोई बासठ साल पहिले
यहाँ भी
वहां भी.........

Thursday, August 13, 2009

भजन.....(Rajasthai Bhasa men)

(तर्ज़ : राजस्थानी लोक गीत 'पणिहारी' )

आवो म्हारे घर कान्हजी औ
म्हारा मदनगोपाल
म्हारा नंदगोपाल
उबी उबी जौवूं थारी बाट, बृजलाला...........

पलक पावडा बिछा रया सा
म्हारा गुवालां रा सिरदार
सुणज्यो गोप्यां रा दिलदार
पाट बिराजो सा , बृजलाला..............

अंसुवन धोवुं चरणकमल
श्यामा करो बिस्-राम
मोहन करो आराम
थक्या थक्या आया सा, बृजलाला............

शरबत मीठो गुलाब रो
कान्हा चांदी री गिलास
कईं ना लागी थाने प्यास
होठां सुं लगाओ सा , बृजलाला...................

छप्पन भोग पकवान है
कान्हा सोने केरो थाल
सोरम आवे अपरम्पार
आप आरोगो सा , बृजलाला..........

रेशम रा गिदरा बिछा दिया सा
पोढो जसोदा रा लाल
माता देवकी रा लाल
लोरी सुणावां सा, बृजलाला.........

सुपने में बिन्दरा बन सज्यो सा
म्हारा नटवर लाल
म्हारा मदनगोपाल
रास रचाओ सा , बृजलाला.........

जल जमना रो जोर को सा
बिंरो लीलो लीलो रंग
जियां थांरा सगळा अंग
बांसरी बजाओ सा, बृजलाला........

आणंद हिये में देवज्यो सा
म्हारा पालन हार
म्हारा किरपानिधान
शोभ्या थारी गावां सा, बृजलाला..........

Tuesday, August 11, 2009

भेद अभेद का /Bhed abhed ka

आक और गुलाब में
करता है अंतर
मनुज
खेल है यह
पूर्वाग्रह और
विभेद का,
तलाश लेती है
मधुमख्खी
सुमधुर मधु
दोनों ही में -------
यही है
भेद अभेद का .......

Aak aur gulab men
Karta hai antar
Manuj
Khel hai yah
Purvagrah aur
Vibhed ka......
Talash leti hai
Madhumakhkhi
Sumadhur madhu
Dono hi men.........
Yahi hai
Bhed abhed ka ........

Monday, August 10, 2009

अवगुण/Avagun

काँटा बाड़ का
बाड़ को नहीं
खुभता
अवगुण खुद का
खुद को नहीं
चुभता.......

Kaanta barh ka
Barh ko nahin
Khubta
Avagun khud ka
Khud ko nahin
Chubhta.....

(Inspired by a Rajasthani wisdom)